Pandri Gram Seva Samiti Land Dispute: पंडरी में ग्राम सेवा समिति की जमीन की अदला-बदली का आवेदन खारिज, ट्रस्ट में नियुक्ति को चुनौती, करोड़ों की जमीन को बेचने का आरोप
रायपुर के पंडरीतराई स्थित Pandri Gram Seva Samiti की करीब 10.38 एकड़ जमीन में से 0.0220 हेक्टेयर भूमि के विनिमय और उसके नामांतरण आवेदन की सुनवाई करते हुए तहसीलदार रायपुर ने बबिता अग्रवाल की ओर से प्रस्तुत नामांतरण आवेदन खारिज कर दिया है।
रायपुर। राजधानी रायपुर के पंडरीतराई स्थित ग्राम सेवा समिति की करीब 10.38 एकड़ जमीन में से 0.0220 हेक्टेयर भूमि के विनिमय और उसके नामांतरण आवेदन की सुनवाई करते हुए तहसीलदार रायपुर ने बबिता अग्रवाल की ओर से प्रस्तुत नामांतरण आवेदन खारिज कर दिया है।
आदेश में संबंधित भूमि को ग्राम सेवा समिति सार्वजनिक न्यास की संपत्ति माना गया है और कहा गया है कि नामांतरण आवेदन के साथ पंजीयक सार्वजनिक न्यास की आवश्यक अनुमति प्रस्तुत नहीं की गई।
मामले में आपत्तिकर्ताओं ने जमीन के विनिमय की प्रक्रिया और ग्राम सेवा समिति की ओर से दस्तावेज निष्पादित करने वाले व्यक्ति के अधिकार पर भी सवाल उठाए थे। वहीं, आवेदिका की ओर से तर्क दिया गया कि पंजीकृत विनिमय विलेख के आधार पर नामांतरण किया जाना चाहिए और दस्तावेज की वैधता का परीक्षण राजस्व न्यायालय के बजाय सक्षम सिविल न्यायालय के क्षेत्राधिकार का विषय है।
10.38 एकड़ जमीन में से 0.0220 हेक्टेयर का हुआ विनिमय
राजस्व प्रकरण ग्राम पंडरीतराई, पटवारी हल्का नंबर 47, तहसील एवं जिला रायपुर की शीट नंबर 28, प्लॉट नंबर 1 से संबंधित है।
प्रकरण के अनुसार बबिता अग्रवाल के नाम दर्ज खसरा नंबर 205/1 की 0.0220 हेक्टेयर भूमि और ग्राम सेवा समिति के नाम दर्ज करीब 10.38 एकड़ भूमि में से समान रकबे की जमीन के बीच विनिमय किया गया।
इसके लिए विनिमय विलेख यानी तबादलानामा पंजीकृत कराया गया। इसके आधार पर बबिता अग्रवाल ने संबंधित भूमि अपने नाम दर्ज कराने के लिए तहसीलदार न्यायालय में नामांतरण आवेदन प्रस्तुत किया था।
आपत्ति में उठाया गया सार्वजनिक न्यास का मुद्दा
नामांतरण प्रकरण में इश्तहार प्रकाशित होने के बाद महंत रामआशीष दास, राहुल गिरी गोस्वामी और एक अन्य आपत्तिकर्ता ने लिखित आपत्तियां पेश कीं।
आपत्तिकर्ताओं का कहना था कि ग्राम सेवा समिति पंडरीतराई सार्वजनिक न्यास है और संबंधित जमीन न्यास की संपत्ति है। उनका तर्क था कि लोक न्यास की अचल संपत्ति के विक्रय, विनिमय, दान या अन्य हस्तांतरण के लिए छत्तीसगढ़ लोक न्यास अधिनियम के तहत पंजीयक सार्वजनिक न्यास की पूर्व अनुमति आवश्यक है।
तहसीलदार के आदेश में भी इस पहलू का परीक्षण किया गया और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर संबंधित भूमि को ग्राम सेवा समिति सार्वजनिक न्यास की भूमि माना गया।
अनुमति के अभाव में नामांतरण आवेदन खारिज
प्रकरण में तहसीलदार के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह था कि पंजीकृत विनिमय विलेख के आधार पर नामांतरण किया जा सकता है या नहीं।
तहसीलदार के आदेश के अनुसार, 14 अक्टूबर 2025 के पंजीकृत विनिमय विलेख के आधार पर नामांतरण आवेदन के साथ पंजीयक सार्वजनिक न्यास की अनुमति प्रस्तुत या संलग्न नहीं की गई थी।
इसी आधार पर बबिता अग्रवाल का नामांतरण आवेदन खारिज कर दिया गया और प्रकरण को रिकॉर्ड में दाखिल करने का आदेश दिया गया। यानी फिलहाल तहसीलदार के स्तर पर इस विनिमय के आधार पर संबंधित जमीन का नामांतरण आवेदिका के पक्ष में नहीं हुआ है।
अजय तिवारी के ट्रस्टी की भूमिका होने पर भी सवाल
मामले में ग्राम सेवा समिति की ओर से विनिमय विलेख निष्पादित करने वाले अजय तिवारी की भूमिका को लेकर भी आपत्तिकर्ताओं ने सवाल उठाए।
आपत्तियों में कहा गया कि अजय तिवारी ने ग्राम सेवा समिति का ट्रस्टी बनने के लिए आवेदन किया था, लेकिन पंजीयक लोक न्यास एवं अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), रायपुर ने 10 जून 2024 को यह आवेदन निरस्त कर दिया था।
आपत्तिकर्ताओं का तर्क था कि ऐसी स्थिति में अजय तिवारी के पास न्यास की संपत्ति के विनिमय के लिए अधिकार था या नहीं, यह जांच का विषय है।
दूसरी ओर, आवेदिका की ओर से प्रस्तुत तर्क में कहा गया कि ग्राम सेवा समिति की ओर से अजय तिवारी अधिकृत व्यक्ति और मंत्री के रूप में विनिमय की कार्रवाई की गई थी।
इस तरह इस मामले में जमीन के विनिमय के साथ-साथ दस्तावेज निष्पादित करने वाले व्यक्ति के अधिकार का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है।
आवेदिका ने पंजीकृत दस्तावेज का दिया हवाला
बबिता अग्रवाल की ओर से प्रस्तुत लिखित तर्क में कहा गया कि उन्होंने अपनी 0.0220 हेक्टेयर भूमि के बदले ग्राम सेवा समिति की भूमि में से समान रकबे की जमीन पंजीकृत विनिमय विलेख के माध्यम से प्राप्त की है।
उनकी ओर से यह भी तर्क दिया गया कि निर्धारित स्टांप शुल्क का भुगतान किया गया है और दस्तावेज विधिवत पंजीकृत है।
आवेदिका की ओर से यह कानूनी दलील भी दी गई कि नामांतरण की कार्यवाही के दौरान राजस्व न्यायालय को पंजीकृत दस्तावेज की वैधता पर अंतिम निर्णय देने का अधिकार नहीं है। दस्तावेज की वैधता का विवाद होने पर सक्षम सिविल न्यायालय में उसका परीक्षण हो सकता है।
1971 के पुराने राजस्व रिकॉर्ड का भी उल्लेख
तहसीलदार के आदेश में वर्ष 1971 के एक पुराने राजस्व प्रकरण का भी उल्लेख किया गया है।
रिकॉर्ड के अनुसार उस समय ग्राम सेवा समिति के मंत्री नंद कुमार दानी ने पंडरीतराई स्थित कुछ जमीन के विक्रय की अनुमति के लिए आवेदन किया था। तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर रायपुर ने इस संबंध में आदेश पारित किया था। हालांकि संबंधित जमीन का विक्रय नहीं हुआ था।
तहसीलदार ने इस पुराने राजस्व रिकॉर्ड सहित प्रकरण में उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण किया और संबंधित भूमि को ग्राम सेवा समिति सार्वजनिक न्यास की संपत्ति माना।
जमीन की सुरक्षा और निर्माण हटाने की मांग
नामांतरण आवेदन खारिज होने के बाद आपत्तिकर्ताओं की ओर से ग्राम सेवा समिति की जमीन की सुरक्षा को लेकर भी प्रशासन से कार्रवाई की मांग की गई है।
आपत्तिकर्ताओं ने संभागायुक्त को आवेदन देकर जमीन पर कथित निर्माण को हटाने और न्यास की संपत्ति को सुरक्षित रखने की मांग की है।
अब आगे क्या
तहसीलदार के मौजूदा आदेश का सीधा निष्कर्ष नामांतरण आवेदन को अनुमति न देने और सार्वजनिक न्यास की जमीन के लिए आवश्यक अनुमति के अभाव से संबंधित है।
संबंधित पक्ष उपलब्ध राजस्व एवं पंजीकृत दस्तावेजों के आधार पर आगे की वैधानिक कार्रवाई कर सकते हैं।
न्यायालय तहसीलदार के आदेश इस तथ्य को शामिल किया गया है कि सार्वजनिक न्यास की संपत्ति के हस्तांतरण से जुड़े मामलों में केवल पंजीकृत दस्तावेज होना ही पर्याप्त नहीं है, संबंधित न्यास संबंधी वैधानिक अनुमति भी जरूरी है।