लंदन से जंतर-मंतर तक 'कॉकरोच' कहां से जुटे, मुखौटों के पीछे कौन
Cockroach Janata Party: प्रदीप शर्मा। राजनीति में कई बार घटनाएं ऐसी घटती हैं जो महज संयोग लगती हैं, (Jantar Mantar Protest) लेकिन उनके समय, संदर्भ को देखें तो उससे देशविरोधी विदेशी ताकतों की साजिश भी साफ नजर आती है।
शनिवार को कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जब एक ओर लंदन में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के कार्यक्रम में विरोध और तीखे सवालों के कारण माहौल गर्माया, वहीं दूसरी ओर उसी दिन दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रमुख अभिजीत दीपके के नेतृत्व में बड़ी संख्या में लोग जुटे।
सवाल यह है कि क्या देश को कमजोर करने वाली ताकतों के इशार पर एक साथ ऐसा राजनीतिक नैरेटिव गढ़ा जा रहा है, जो भारतीय लोकतंत्र में मिली अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल भारत की संस्थाओं, उसकी छवि और उसके लोकतांत्रिक ढांचे को कठघरे में खड़ा करने के लिए कर रहा है?
लंदन में भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यक्रम में हंगामा होता है। भारत की न्यायपालिका, लोकतंत्र और असहमति को लेकर सवाल उठाए जाते हैं। उधर, उसी दिन दिल्ली के जंतर-मंतर पर “कॉकरोच” राजनीति के नाम पर बड़ी राजनीतिक गोलबंदी दिखाई देती है।गौर करें क्या यह सिर्फ घटनाओं का इत्तेफाक है?

या फिर एक ऐसा नैरेटिव तैयार किया जा रहा है, जिसमें भारत की हर संवैधानिक संस्था—चाहे वह सरकार हो, संसद हो या न्यायपालिका—लगातार निशाने पर रहे? क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक असहमति के नाम पर भारत की वैश्विक छवि को चोट पहुंचाने की कोशिश हो रही है?
क्या देश के भीतर पैदा होने वाले राजनीतिक विमर्श को विदेशी मंचों तक ले जाकर भारत को एक असफल या दमनकारी लोकतंत्र के रूप में पेश करने की रणनीति बनाई जा रही है? या फिर यह लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है, जहां सवाल पूछना और विरोध दर्ज कराना हर नागरिक का अधिकार है?लेकिन जब एक ही दिन, एक जैसे प्रतीक, एक जैसे आरोप और एक जैसी राजनीतिक भाषा देश और विदेश दोनों मंचों पर दिखाई दे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
हालांकि दोनों घटनाओं के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है, लेकिन राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर एक सवाल जरूर गूंजता रहा, यह महज संयोग था या किसी बड़े राजनीतिक-सामाजिक प्रयोग की झलक?
लंदन से शुरुआत
लंदन में आयोजित एक विश्वविद्यालय कार्यक्रम के दौरान CJI सूर्यकांत से भारत में असहमति की आवाजों, न्यायपालिका की भूमिका और उनके कुछ पुराने बयानों को लेकर सवाल पूछे गए। कार्यक्रम के दौरान हाल के दिनों में चर्चित रही “कॉकरोच टिप्पणी” का भी जिक्र हुआ। स्थिति तब तनावपूर्ण हो गई जब मॉडरेटर ने सवालों को मुख्य विषय से अलग बताते हुए बीच में रोकने की कोशिश की। बाद में भारतीय उच्चायोग ने इस व्यवहार को “गैर-जिम्मेदाराना” बताते हुए लोकतांत्रिक विमर्श में शालीनता और सम्मान बनाए रखने की बात कही।

जंतर मंतर में प्रदर्शन
इसके तुरंत बाद शनिवार सुबह ब्रिटिश एयरवेज की उड़ान से अभिजीत दीपके दिल्ली पहुंचे और कुछ ही घंटों बाद जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शन के केंद्र में दिखाई दिए। अपने भाषण में उन्होंने सरकार पर शिक्षा, रोजगार और सामाजिक मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि यदि सत्ता जनता को “कीड़े-मकोड़े” समझती है, तब भी लोग अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की क्षमता रखते हैं।
दो मंच दो नजरिया: निशाना एक
लंदन में “कॉकरोच” शब्द सवालों के जरिए सत्ता और संस्थाओं पर टिप्पणी का प्रतीक बना, जबकि दिल्ली में यही शब्द विरोध की राजनीति का नारा बनकर उभरा। एक ही दिन में हजारों किलोमीटर दूर दो अलग-अलग मंचों पर एक ही प्रतीक का इस्तेमाल होना अपने आप में चर्चा का विषय रहा।

अलग-अलग मंचों पर एक साथ गढ़े गए नरेटिव
असल में “कॉकरोच” की आड़ में सत्ता, विरोध, असहमति और पहचान की राजनीति के बीच चल रही लड़ाई का नरेटिव गढ़ा जा रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुख्य न्यायधीश से असहमति पर सवाल पूछे जा रहे हैं, वो भी संविधान की प्रतियां हाथ में लेकर और उन्हीं ताकतों के इशारे पर जतंर मंतर पर प्रदर्शन हो रहे हैं! जो हैरान करने वाले हैं।
लंदन में उठे सवाल हों या दिल्ली में गूंजे नारे…दोनों घटनाओं ने एक बार फिर यह दिखाया कि भारत के लोकतंत्र को निशाना बनाया जा रहा है। सवाल सिर्फ इतना है कि यह समानांतर घटनाओं का संयोग था, या फिर एक ऐसा राजनीतिक प्रयोग, जिसकी पटकथा देश और विदेश के अलग-अलग मंचों पर एक साथ लिखी जा रही है।

