Pitru Paksha 2026 : श्राद्ध-तर्पण में किन बर्तनों का करें इस्तेमाल? जानें स्टील, लोहे और कांच को लेकर मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध कर्म में चांदी, तांबा, पीतल और कांसे के पात्रों को माना जाता है शुभ, स्टील-लोहे के साथ कांच और प्लास्टिक के बर्तनों से परहेज की परंपरा

Pitru Paksha 2026 : धर्म डेस्क। पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान को लेकर धार्मिक परंपराओं में कई तरह के नियम बताए गए हैं। इनमें पूजा के लिए इस्तेमाल होने वाले पात्रों को लेकर भी मान्यताएं हैं। परंपरा के अनुसार, श्राद्ध कर्म में चांदी के बर्तनों को शुभ माना जाता है, जबकि कुछ धातुओं और सामग्रियों से बने पात्रों से परहेज करने की बात कही जाती है।
चांदी के पात्र माने जाते हैं शुभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज में चांदी के बर्तनों का इस्तेमाल शुभ माना जाता है। यदि चांदी के पात्र उपलब्ध न हों तो कई परंपराओं में तांबा, पीतल या कांसे के बर्तनों का उपयोग किया जाता है। कुछ स्थानों पर पात्रों के विकल्प के तौर पर दोने और पत्तल इस्तेमाल करने की परंपरा भी है।
स्टील और लोहे को लेकर क्या है मान्यता?
कई धार्मिक परंपराओं में श्राद्ध और तर्पण के दौरान स्टील और लोहे के बर्तनों के इस्तेमाल से बचने की सलाह दी जाती है। इसी तरह कांच और प्लास्टिक के पात्रों को भी श्राद्ध कर्म में उपयोग न करने की मान्यता कुछ क्षेत्रों में प्रचलित है।
हालांकि, ये बातें धार्मिक मान्यताओं और पारंपरिक रीति-रिवाजों पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों, समुदायों और परिवारों में श्राद्ध कर्म की विधि तथा पात्रों के इस्तेमाल को लेकर अलग परंपराएं हो सकती हैं।
इस तरह किया जाता है तर्पण
परंपरा के अनुसार, तर्पण से पहले सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। इसके बाद पितरों का स्मरण करते हुए स्वच्छ पात्र में जल और काले तिल लिए जाते हैं। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के नाम और गोत्र का स्मरण करते हुए जल अर्पित करने की परंपरा है।
तर्पण के बाद पितरों के निमित्त भोजन कराने, अन्न-वस्त्र का दान करने या अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्य दान-पुण्य करने की परंपरा भी कई परिवारों में निभाई जाती है।
27 सितंबर से शुरू होगा पितृपक्ष
दिए गए विवरण के अनुसार, पितृपक्ष 2026 की शुरुआत 27 सितंबर से होगी और 10 अक्टूबर को इसका समापन होगा। इस अवधि में लोग अपनी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और पितरों का स्मरण करते हैं।


