Supreme Court: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई टली, SC ने दिया 10 दिन का समय
Supreme Court : मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए याचिकाकर्ताओं को 10 दिन का समय दिया।

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आगे बढ़ गई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ताओं को निर्वाचन आयोग के जवाबी हलफनामे पर अपना पक्ष रखने के लिए 10 दिन का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होने की संभावना जताई गई है, हालांकि अंतिम तारीख अदालत की सूची के अनुसार तय होगी। इस मामले में निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।
निर्वाचन आयोग के जवाब पर पक्ष रखने के लिए मांगा समय
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता राकेश सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत से जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय देने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग ने अपना जवाबी हलफनामा पिछली रात दाखिल किया था। ऐसे में याचिकाकर्ताओं को दस्तावेजों का अध्ययन करने और अपना जवाब यानी रिजॉइंडर दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए।
पीठ ने इस मांग को स्वीकार करते हुए 10 दिन की मोहलत दे दी। इसके चलते मामले में फिलहाल याचिकाओं के गुण-दोष पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। अगली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं के जवाब और निर्वाचन आयोग के पक्ष पर आगे विचार किया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान ऑडियो-वीडियो बंद होने की चर्चा
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के एक बड़े हिस्से के दौरान कोर्ट की ऑडियो-वीडियो फीड बंद रही। कार्यवाही के अंतिम हिस्से में फीड दोबारा चालू हुई, जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. ए.एम. सिंघवी और मेनका गुरुस्वामी दिखाई दिए। याचिकाकर्ताओं की ओर से फाइल नोटिंग और अन्य रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग भी उठाई गई।
हालांकि, ऑडियो-वीडियो बंद रहने के दौरान हुई पूरी चर्चा का विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी में स्पष्ट नहीं है। इसलिए इस दौरान हुई बातचीत या अदालत की टिप्पणियों के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।
फॉर्म-6 और निर्वाचन आयोग के प्रेस नोट पर सवाल
सुनवाई में सांसद डोला सेन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े मुद्दे उठाए। उन्होंने ऑनलाइन फॉर्म-6 में कथित छेड़छाड़ और आयोग की ओर से जारी एक प्रेस नोट का उल्लेख किया। उनके अनुसार, प्रेस नोट में यह कहा गया था कि अदालत की पीठ ने संबंधित कार्रवाई को अधिकृत किया है।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत इस मामले की जांच करेगी। याचिकाकर्ताओं की ओर से निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड और निर्णय प्रक्रिया की पड़ताल की मांग भी की गई है। मामले में इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष आना अभी बाकी है।
राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं की याचिकाएं भी शामिल
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले से संबंधित याचिकाओं में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं और अन्य याचिकाकर्ताओं की अर्जियां भी शामिल हैं। याचिकाओं में निर्वाचन आयोग के फैसलों की प्रक्रिया, मतदाता सूची में नाम हटाए जाने और SIR के संचालन को लेकर कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए गए हैं।
याचिकाकर्ताओं की आशंका है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान उचित सूचना और प्रक्रिया का पालन नहीं होने पर पात्र मतदाता प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता और संबंधित रिकॉर्ड की जांच की जरूरत पर जोर दिया है।
निर्वाचन आयोग ने आरोपों को किया खारिज
निर्वाचन आयोग ने अपने जवाबी हलफनामे में एकतरफा निर्णय लेने के आरोपों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि SIR से संबंधित फैसले तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से लिए गए थे और फॉर्म-6 में कोई औपचारिक बदलाव नहीं किया गया है।
इस तरह मामले में याचिकाकर्ताओं के आरोपों और निर्वाचन आयोग के जवाब के बीच प्रमुख मुद्दों पर अदालत को विचार करना है। अगली सुनवाई में दाखिल किए जाने वाले जवाबी हलफनामे और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर आगे की कार्यवाही हो सकती है।
क्या है SIR और क्यों उठा विवाद?
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR मतदाता सूची की विस्तृत जांच और उसे अपडेट करने की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं के नाम सूची में सुनिश्चित करना और गलत या अपात्र प्रविष्टियों में जरूरी सुधार करना है। निर्वाचन आयोग इसी प्रक्रिया के जरिए मतदाता सूची को संशोधित करता है।
हालांकि, SIR को लेकर याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि कुछ स्थानों पर मतदाताओं के नाम हटाने या उनकी पात्रता पर सवाल उठाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही। उनका कहना है कि यदि उचित सूचना, सुनवाई और नाम दोबारा जुड़वाने के पर्याप्त अवसर नहीं मिले, तो पात्र मतदाता अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।


