Bastar Dussehra: 12 साल की पीहू पर सवार होंगी काछनदेवी, कांटों के झूले पर देंगी उत्सव की अनुमति, आज निभाई जाएगी 618 साल पुरानी परंपरा
Bastar Dussehra Kachan Devi: बस्तर दशहरा में 12 साल की पीहू दास काछनगादी की रस्म निभाएंगी। जानिए कांटों के झूले, नौ दिन की पूजा और 22 पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा की खास बातें।

जगदलपुर। बस्तर दशहरा की सदियों पुरानी परंपराओं में काछनगादी की रस्म का विशेष महत्व है। इस अनुष्ठान में पनका समाज की 12 वर्षीय पीहू दास पर काछनदेवी सवार होगी। बेल के कांटों से बने विशेष झूले पर झूलने के बाद देवी से बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति ली जाती है।
जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में यह रस्म निभाई जाती है। परंपरा के अनुसार, बस्तर राजपरिवार के सदस्य और दशहरा समिति के पदाधिकारी देवी से उत्सव की अनुमति मांगते हैं। अनुमति मिलने के बाद दशहरा की आगे की रस्में शुरू होती हैं।
नौ दिनों तक पूजा और उपवास
काछनगादी की रस्म निभाने वाली पीहू दास पांचवीं कक्षा की छात्रा हैं। इस अनुष्ठान से पहले उन्होंने करीब नौ दिनों तक देवी की पूजा की और उपवास रखा। पीहू चौथी बार इस परंपरा में शामिल हो रही हैं।
इससे पहले पनका समाज की अनुराधा ने करीब पांच से छह साल तक यह जिम्मेदारी निभाई थी। काछनगादी में पनका समाज की कन्या की भूमिका पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है।
22 पीढ़ियों से एक परिवार बना रहा कांटों का झूला
काछनगादी के दौरान इस्तेमाल होने वाला बेल के कांटों का झूला भी इस परंपरा की खास पहचान है। लामनी गांव के जगत राम नेताम का परिवार करीब 22 पीढ़ियों से झूला बनाने की जिम्मेदारी निभाता आ रहा है।
परिवार के सदस्य जंगल से बेल की कांटेदार डालियां लाकर पारंपरिक तरीके से झूला तैयार करते हैं। इस धार्मिक जिम्मेदारी को निभाने के लिए परिवार में विशेष तैयारियां की जाती हैं। रस्म से जुड़े नौ दिनों के दौरान परिवार के घर में अखंड दीपक जलाने की परंपरा भी है।
पीढ़ियां बदलने के बावजूद परिवार इस जिम्मेदारी को आगे बढ़ाता रहा है। यह परंपरा स्थानीय समुदायों की आस्था और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी हुई है।
नवरात्र से पहले होती है काछनगादी की रस्म
बस्तर दशहरा की प्रमुख रस्मों में शामिल काछनगादी नवरात्र से ठीक एक दिन पहले आयोजित की जाती है। इस दौरान बस्तर राजपरिवार के सदस्य और दशहरा समिति के पदाधिकारी काछनगुड़ी पहुंचकर काछनदेवी से उत्सव मनाने की अनुमति मांगते हैं।
परंपरा के अनुसार, देवी की अनुमति मिलने के बाद आतिशबाजी की जाती है। काछनदेवी को रण की देवी के रूप में भी जाना जाता है। इस आयोजन में पनका समाज की महिलाएं धनकुल वादन के साथ पारंपरिक गीत भी गाती हैं।
रैला देवी की पूजा का भी विशेष महत्व
बस्तर दशहरा से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में रैला देवी की पूजा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। काछनगादी के बाद जगदलपुर के गोल बाजार में रैला देवी की पूजा का विधान है। इन आयोजनों में बस्तर संभाग के साथ दूसरे क्षेत्रों से भी लोग पहुंचते हैं।
रविवार से शुरू होंगी दशहरा की अगली रस्में
काछनदेवी से अनुमति मिलने के बाद दशहरा की अगली धार्मिक रस्में शुरू होती हैं। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, रविवार को कलश स्थापना के साथ जोगी बिठाई की रस्म निभाई जाएगी।
बस्तर दशहरा की खासियत यह है कि इसमें अलग-अलग समुदायों, गांवों और परिवारों को विशिष्ट जिम्मेदारियां मिली हुई हैं। कहीं रथ निर्माण की परंपरा निभाई जाती है, तो कहीं पूजा और अनुष्ठानों की जिम्मेदारी पीढ़ियों से आगे बढ़ाई जाती है। यही परंपराएं बस्तर दशहरा को अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान देती हैं।


