वॉशिंगटन डीसी। जब भी अमेरिका और रूस के बीच कोई बड़ा भू-राजनीतिक फैसला होता है, तो उसकी सीधी आंच भारत की अर्थव्यवस्था तक पहुंचती ही है। इस बार मामला सीधे हमारे फ्यूल टैंक और ग्लोबल ट्रेड से जुड़ा है। अमेरिका ने रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है, और इस फेर में भारत पर 100% तक टैरिफ का खतरा मंडरा रहा है।

क्या है अमेरिकी संसद का नया बिल और भारत पर इसका असर?

अमेरिकी संसद के निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने एक सख्त बिल पास किया है, जिसके तहत रूस से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदने वाले 5 देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है। इस लिस्ट में चीन और भारत के साथ-साथ स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान का नाम भी शामिल है।

इस बिल को आधिकारिक तौर पर ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ नाम दिया गया है। जैसे ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड इस पर अपने हस्ताक्षर करेंगे, यह तुरंत कानून बन जाएगा।

भारत की एनर्जी सिक्योरिटी पर क्यों आया संकट?

यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदना तेजी से बढ़ाया था। हालात यह हैं कि आज भारत अपनी जरूरत का 40% से ज्यादा क्रूड ऑयल अकेले रूस से आयात कर रहा है, जो कभी रोजाना 16 से 20 लाख बैरल तक पहुंच जाता है।

अब अमेरिका की इस नई चाल के बाद भारत के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है। पहली स्थिति,अगर भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखता है, तो अमेरिका में भारतीय सामान महंगा हो जाएगा। इससे टेक्सटाइल, जेम्स-ज्वेलरी, इंजीनियरिंग गुड्स और केमिकल्स जैसे तमाम एक्सपोर्ट ऑर्डर्स पर बुरा असर पड़ सकता है।

दूसरी स्थिति में अगर भारत दबाव में आकर रूस से दूरी बनाता है, तो उसे महंगे विकल्पों की तरफ जाना होगा, जिससे देश में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने का सीधा खतरा पैदा हो जाएगा। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय पहले ही साफ कर चुका है कि देश के राष्ट्रीय हितों से किसी भी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा।

रूस का 'शैडो फ्लीट' और दुनिया भर पर इसका असर

इस नए कानून के दायरे में सिर्फ तेल खरीदने वाले देश ही नहीं, बल्कि रूस का ऊर्जा उद्योग, वित्तीय संस्थान और रक्षा क्षेत्र भी हैं। अमेरिका उन खास टैंकरों के नेटवर्क पर भी शिकंजा कसने की तैयारी में है, जिन्हें रूस का 'शैडो फ्लीट' कहा जाता है। ये वे जहाज हैं जो पुराने प्रतिबंधों को धेंगा दिखाते हुए रूस का तेल चुपचाप दुनिया के दूसरे कोनों तक पहुंचाते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि इस बिल में यूरोपीय देशों के लिए नरमी बरती गई है। फ्रांस, हंगरी और बेल्जियम जैसे देशों को टैरिफ से छूट मिल सकती है क्योंकि वे रूस से बहुत सीमित मात्रा में गैस आयात करते हैं और धीरे-धीरे अपनी निर्भरता घटा भी रहे हैं। वहीं, अमेरिका को यह भी अधिकार मिल गया है कि वह जरूरत पड़ने पर रूसी सामान पर 500% तक का भारी-भरकम टैरिफ थोप सकता है।

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