Pola Tihar 2026: छत्तीसगढ़ में इस दिन मनाया जाएगा पोला तिहार, जानिए पूजा विधि, मान्यता और खास परंपराएं
Pola Tihar 2026: पोला तिहार इस साल 11 सितंबर को मनाया जाएगा। जानिए छत्तीसगढ़ के पोला पर्व की पूजा विधि, मान्यता, बैल श्रृंगार, पारंपरिक पकवान और खास परंपराएं।
रायपुर। छत्तीसगढ़ का प्रमुख लोक पर्व पोला तिहार (पोरा) इस साल 11 सितंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जाएगा। खेती-किसानी और पशुधन से गहराई से जुड़ा यह पर्व किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है। पोला के दिन किसान अपने बैलों और अन्य पशुधन के प्रति आभार व्यक्त करते हैं, उन्हें नहलाकर सजाते हैं और विधि-विधान से पूजा करते हैं।
पोला तिहार केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति, कृषि परंपरा और लोक जीवन का भी अहम हिस्सा है। इस दिन घरों में ठेठरी, खुरमी समेत कई पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। वहीं बच्चे मिट्टी के बैल और दूसरे पारंपरिक खिलौनों से खेलते हैं।
खेती-किसानी से जुड़ा है पोला तिहार
छत्तीसगढ़ में पोला पर्व मूल रूप से खेती-किसानी और पशुधन के सम्मान से जुड़ा हुआ है। खेती के शुरुआती और व्यस्त दौर के बाद भाद्रपद अमावस्या के दिन यह त्योहार मनाने की परंपरा है।
किसानों के लिए बैल खेती के काम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए पोला के दिन बैलों को कृषि कार्य से आराम दिया जाता है और उनकी विशेष रूप से पूजा की जाती है।
पोला से जुड़ी क्या है मान्यता?
लोक मान्यता के अनुसार, पोला पर्व के समय अन्नमाता गर्भ धारण करती हैं। इसका संबंध धान की फसल में दूध भरने की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है। इसी वजह से पोला की पूर्व रात्रि को खेतों में गर्भ पूजन की परंपरा भी बताई जाती है।
मान्यता है कि इस दौरान खेतों में जाना उचित नहीं माना जाता। पोला का यह पक्ष किसानों की प्रकृति, फसल और कृषि चक्र के प्रति आस्था को दर्शाता है।
पोला के दिन बैलों का होता है खास श्रृंगार
पोला के दिन किसान सुबह जल्दी उठकर अपने गाय-बैलों और अन्य पशुधन को नहलाते हैं और उनकी अच्छी तरह साफ-सफाई करते हैं। इसके बाद बैलों का विशेष श्रृंगार किया जाता है। बैलों के सींगों को रंगने के साथ उन पर तेल या पॉलिश लगाई जाती है।
गले में फूलों की माला, घुंघरू, घंटियां और पारंपरिक आभूषण पहनाए जाते हैं। बैलों को सुंदर झूल से भी सजाया जाता है। इसके बाद तिलक लगाकर बैलों की पूजा और आरती की जाती है। इस दिन उनसे किसी भी तरह का कृषि कार्य नहीं कराया जाता।
घरों में बनते हैं ठेठरी-खुरमी समेत कई छत्तीसगढ़ी पकवान
पोला तिहार के मौके पर छत्तीसगढ़ के घरों में पारंपरिक पकवानों की खुशबू बिखर जाती है। महिलाएं विशेष रूप से ठेठरी, खुरमी, चीला, अनरसा, गुझिया, बड़ा और खीर जैसे पकवान तैयार करती हैं। पूजा के दौरान मिट्टी के पारंपरिक बर्तनों और खिलौनों में इन पकवानों को भरने की परंपरा है। इसके पीछे मान्यता है कि घर में अन्न और समृद्धि हमेशा बनी रहे।
बच्चों के लिए भी खास है पोला
पोला तिहार में बच्चों की भूमिका भी खास होती है। इस दिन उन्हें मिट्टी से बने बैल, बैलगाड़ी, चूल्हा, चक्की और जाता जैसे पारंपरिक खिलौने दिए जाते हैं। बच्चे इन मिट्टी के खिलौनों की पूजा करते हैं और उनमें थोड़े-थोड़े पकवान भरते हैं। कई स्थानों पर बच्चे अपने मिट्टी के बैल लेकर घर-घर जाते हैं, जहां उन्हें दक्षिणा भी दी जाती है।
बैलगाड़ी सजाने और दौड़ की होती है परंपरा
ग्रामीण इलाकों में पोला के अवसर पर बैलों की जोड़ियों को सजाकर विभिन्न पारंपरिक प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं। बैलगाड़ी वाले अपने बैलों को आकर्षक तरीके से सजाते हैं और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं। कुछ स्थानों पर बैलों की दौड़ भी आयोजित की जाती है। प्रतियोगिता में विजेता बैल की जोड़ी और उसके मालिक को सम्मानित या पुरस्कृत किया जाता है।
पोरा पटकने की परंपरा भी है खास
पोला से जुड़ी एक अन्य लोक परंपरा पोरा पटकना है। गांवों में युवक-युवतियां और बच्चे अपने साथियों के साथ गांव के बाहर मैदान में जाते हैं। इस परंपरा में लोग अपने घरों से मिट्टी के खिलौने लेकर निर्धारित स्थान पर उन्हें फोड़ते हैं। इसके बाद अलग-अलग टोलियां बनाकर सूरपाटी, कबड्डी और खो-खो जैसे पारंपरिक खेल खेले जाते हैं। यह परंपरा पोला पर्व को केवल पूजा तक सीमित नहीं रखती, बल्कि इसे सामुदायिक मेल-जोल और मनोरंजन का भी अवसर बनाती है।
महिलाओं के लिए भी पोला का विशेष महत्व
पोला पर्व के कुछ ही दिनों बाद तीजा का त्योहार आता है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ की पारंपरिक संस्कृति में पोला और तीजा का आपस में विशेष संबंध माना जाता है। कई महिलाएं पोला के आसपास अपने मायके आती हैं और परिवार के साथ त्योहार मनाती हैं। इस तरह पोला तिहार महिलाओं, पुरुषों और बच्चों—सभी के लिए अलग-अलग सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व रखता है।
पोला तिहार क्यों है खास?
पोला छत्तीसगढ़ की उस ग्रामीण संस्कृति को दर्शाता है, जिसमें किसान, पशुधन, खेत और अन्न एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। बैलों के सम्मान से लेकर मिट्टी के खिलौनों की पूजा और पारंपरिक पकवानों तक, इस पर्व में प्रदेश की लोक परंपराओं की झलक दिखाई देती है। आज आधुनिक कृषि व्यवस्था में बदलाव के बावजूद छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और कई शहरी परिवारों में पोला तिहार की परंपराएं अब भी उत्साह के साथ निभाई जाती हैं।