Dussehra 2026 : साल में सिर्फ दशहरे पर खुलता है रायपुर का 1000 साल पुराना कंकाली मठ, जानिए अस्त्र-शस्त्र और समाधियों से जुड़ी दिलचस्प कहानी
रायपुर के ऐतिहासिक कंकाली मठ में दशहरे पर होते हैं प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों के दर्शन, नागा साधुओं और रहस्यमयी समाधियों से जुड़ी है सदियों पुरानी परंपरा।
Dussehra 2026 : रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के ब्राह्मणपारा स्थित ऐतिहासिक कंकाली मठ की परंपरा बेहद अनोखी है। कंकाली तालाब के पास स्थित यह मठ साल में केवल एक बार विजयादशमी के अवसर पर श्रद्धालुओं के लिए खोला जाता है। यहां नागा साधुओं के प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की जाती है और भक्तों को उनके दर्शन का अवसर मिलता है। तलवार, भाला, ढाल, कुल्हाड़ी और तीर जैसे हथियारों के साथ यह मठ अपने इतिहास और धार्मिक मान्यताओं के लिए भी प्रसिद्ध है।
श्मशान में हुई थी मठ की स्थापना
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, कंकाली मठ की स्थापना नागा साधुओं ने श्मशान क्षेत्र में की थी। घने जंगलों और श्मशान के बीच साधु यहां मां काली की आराधना और तांत्रिक साधना किया करते थे। कहा जाता है कि दाह संस्कार के बाद अवशेषों को तालाब में विसर्जित किए जाने की परंपरा के चलते इस स्थान का नाम कंकाली तालाब और मठ पड़ा। कंकाली मंदिर में आज जिस प्रतिमा की पूजा होती है, उसके बारे में बताया जाता है कि वह पहले पुराने मठ में स्थापित थी। बाद में प्रतिमा को नए मंदिर में स्थानांतरित कर दिया गया, जबकि नागा साधुओं के अस्त्र-शस्त्र पुराने मठ में ही सुरक्षित रखे गए।
दशहरे पर ही क्यों खुलते हैं मठ के कपाट?
कंकाली मठ की सबसे खास परंपरा यह है कि इसके कपाट साल में केवल दशहरे के दिन खोले जाते हैं। इस अवसर पर प्राचीन अस्त्र-शस्त्रों की सफाई और पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु मठ में पहुंचकर इन ऐतिहासिक वस्तुओं के दर्शन करते हैं। पूजा संपन्न होने के बाद मठ को फिर बंद कर दिया जाता है। यह परंपरा मठ की धार्मिक मान्यताओं और नागा साधुओं की विरासत से जुड़ी हुई है, जो आज भी स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखती है।
13वीं शताब्दी से जुड़ा है इतिहास
बताया जाता है कि कंकाली मठ की स्थापना 13वीं शताब्दी में हुई थी। 17वीं शताब्दी तक यहां सैकड़ों नागा साधुओं के रहने की मान्यता है। मठ के शुरुआती महंतों में कृपालु गिरि, भभूत गिरि और शंकर गिरि के नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं। मठ परिसर में नागा साधुओं की समाधियां भी मौजूद हैं। परंपरा के अनुसार, मठ में रहने वाले किसी साधु की मृत्यु होने पर उसी परिसर में उनकी समाधि बनाई जाती थी। ये समाधियां आज भी इस स्थान के पुराने इतिहास की गवाही देती हैं।
एक हजार साल से अधिक पुराने अस्त्र-शस्त्र हैं खास आकर्षण
कंकाली मठ में रखे प्राचीन अस्त्र-शस्त्र यहां आने वाले श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र हैं। इनमें तलवार, कुल्हाड़ी, भाला, ढाल, चाकू और तीर जैसे हथियार शामिल हैं। मान्यता है कि ये वस्तुएं नागा साधुओं की साधना और परंपरा से जुड़ी हुई हैं। दशहरे के दिन इन हथियारों की सफाई और पूजा की जाती है, जिसके बाद श्रद्धालु इनके दर्शन करते हैं।