रायपुर। Blue Water Mine Raipur: रायपुर शहर से लगे माना के नकटी गांव के पास की ब्लू वॉटर खदान आज अपनी नीली-सी दिखने वाली पानी की सतह और खूबसूरत नजारों के कारण युवाओं के आकर्षण का केंद्र है। लेकिन, इस खूबसूरती के पीछे एक ऐसा खतरा छिपा है, जिसे नजरअंदाज करने की कीमत जान गंवाना है। पिछले करीब नौ सालों में यहां डूबने की कई घटनाएं सामने आई हैं।

आखिर ब्लू वॉटर खदान बनी कैसे?

ब्लू वॉटर कोई प्राकृतिक झील नहीं, बल्कि खनन पूरा होने के बाद छोड़ी हुई गहरी खदान है। समय के साथ खनन बंद होने के बाद इसके गहरे गड्ढे में पानी भरता गया और देखते ही देखते यह जगह तालाब या झील जैसी बन गई। आगे चलकर यही इस जगह की पहचान बन गई। रायपुर शहर के करीब होने से लोग यहां घूमने, फोटो खींचने और पिकनिक मनाने के लिए आने लगे।

पानी नीला क्यों दिखता है?

खदान का पानी साफ मौसम में नीला दिखाई देता है, इसी वजह से इसे ब्लू वॉटर खदान कहा जाने लगा। इसलिए इसे सिर्फ रंग के आधार पर प्राकृतिक झील या सुरक्षित जलाशय समझना खतरनाक है।



ब्लू वॉटर की सबसे खास बात ये कि जो नीला पानी इसे आकर्षक बनाती है, वही इसके खतरे को छिपा देती है। किनारे से देखने पर पानी शांत और सुंदर नजर आता है। लेकिन यह सामान्य तालाब नहीं है। इसकी गहराई करीब 350 से 400 फीट तक है। ऐसी गहराई तैराकों के लिए बड़ा खतरा बन जाती है।

2017 से शुरू हुआ मौतों का सिलसिला

ब्लू वॉटर खदान के नाम के पीछे हादसों का डरावना रिकॉर्ड छिपा है। 2017 में यहां 17 साल युवती की डूबने से मौत हुई। इसके बाद मई 2019 में एक युवक की जान गई। फिर मार्च 2023 में दो युवकों की मौत हुई और जून 2023 में तीन युवकों की डूबने से मौत हुई। इसके बाद अक्टूबर 2025 में दो स्कूली छात्र डूब गए थे। दोनों छात्र अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचे थे और गहरे पानी में चले गए थे। इतनी मौतों के बाद भी लोग खदान तक पहुंचने से खुद को रोक नहीं पा रहे हैं।

अब 2026 में फिर वही कहानी

अगस्त 2026 में मौदहापारा निवासी आदिल खान अपने दोस्तों के साथ ब्लू वॉटर पहुंचा। दोस्तों के बीच खदान के एक छोर से दूसरे छोर तक तैरकर जाने की शर्त लगी और वह गहरे पानी में चला गया। घटना के बाद SDRF ने तलाश शुरू की। करीब 72 घंटों से ज्यादा समय से आदिल की तलाश हो रही है। खदान की गहराई करीब 400 फीट और गोताखोरों की पहुंच लगभग 60 फीट तक है। 400 फीट गहरे पानी में उतरना गोताखोरों के लिए आसान काम नहीं है।



आखिर इतनी खतरनाक है तो लोग पहुंचते क्यों हैं?

इसके पीछे कई कारण हैं... नीला और साफ दिखाई देने वाला पानी, शहर के नजदीक होना, सोशल मीडिया के लिए फोटो और ढेरों रील्स। लोग यह भूल जाते हैं कि मौत की इस खदान का नीला पानी बाहर से भले ही शांत दिखाई दे, लेकिन उसमें उतरना मौत को गले लगाने जैसा है। असल में खदान का किनारा तालाब के किनारे जैसा दिखता है, लेकिन उसके नीचे की गहराई सामान्य तालाब जैसी नहीं है।

अब प्रशासन के सामने क्या विकल्प?

लगातार हादसों के बाद प्रशासन ने अब ब्लू वॉटर खदान को प्रतिबंधित करने और उसके चारों ओर फेंसिंग कराने जा रहा है। आपदा प्रबंधन मंत्री टंक राम वर्मा के अनुसार सुरक्षा के लिए बाहर की टीम भी मौके पर काम कर रही है। फेंसिंग के साथ प्रभावी निगरानी, चेतावनी बोर्ड, प्रवेश पर रोक और स्थानीय स्तर पर निगरानी जैसे कदम उठाए जाएंगे, ताकि हादसों को रोका जा सके।



ब्लू वॉटर की पूरी कहानी एक नजर में

खनन क्षेत्र... खदान बंद हुई... गड्ढे में पानी भरा... नीला पानी आकर्षण बना... लोग घूमने और नहाने पहुंचने लगे... लगातार हादसे हुए और अब प्रशासन प्रतिबंध और फेंसिंग की तैयारी में। ब्लू वॉटर की कहानी इसलिए भी खास है क्योंकि यह सिर्फ एक खदान में हुए हादसों की कहानी नहीं है। यह उस खतरे की कहानी है, कैसे एक बंद खदान धीरे-धीरे पिकनिक स्पॉट बन गई, लेकिन उसकी जानलेवा गहराई को भुला दिया। सबसे बड़ा सवाल अब यही है...क्या फेंसिंग और प्रतिबंध इस खूबसूरत लेकिन खतरनाक जगह तक लोगों की पहुंच को हमेशा के लिए रोक पाएंगे?

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