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Ajab-Gajab : प्रिंसिपल ने दीवारों पर लगाया गोबर, जानें वजह...

Dev Verma
Ajab-Gajab : प्रिंसिपल ने दीवारों पर लगाया गोबर, जानें वजह...
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Ajab-Gajab : प्रिंसिपल ने दीवारों पर लगाया गोबर, जानें वजह…

Ajab-Gajab : नई दिल्ली। दिल्ली यूनिवर्सिटी के लक्ष्मीबाई कॉलेज से एक अनोखा और चौंकाने वाला वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. प्रत्युष वत्सला खुद क्लासरूम की दीवारों पर गाय का गोबर लगाती नजर आ रही हैं। इस दृश्य ने इंटरनेट पर जहां एक तरफ जिज्ञासा और हैरानी पैदा की है, वहीं दूसरी ओर कई लोगों ने इसे भारतीय परंपराओं से जोड़ते हुए सराहना भी की है। सवाल उठता है—क्या यह कोई परंपरागत प्रयोग है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक सोच भी छुपी है?

Ajab-Gajab : गर्मी से राहत के लिए अपनाया देसी उपाय
डॉ. वत्सला ने वायरल वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए बताया कि यह कोई सनक नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक रिसर्च का हिस्सा है। उन्होंने स्पष्ट किया, “हम 'पारंपरिक भारतीय ज्ञान का उपयोग करके तापीय तनाव नियंत्रण का अध्ययन' विषय पर एक शोध परियोजना चला रहे हैं।" इसका उद्देश्य गर्मियों में क्लासरूम को प्राकृतिक और देसी उपायों से ठंडा रखना है, जिससे ऊर्जा की खपत कम हो और पर्यावरण के अनुकूल समाधान मिल सके।

यह प्रयोग लक्ष्मीबाई कॉलेज के सी-ब्लॉक की एक पुरानी इमारत में किया जा रहा है, जहां अत्यधिक गर्मी की समस्या रहती है। रिसर्च के लिए पोर्टा केबिन का चयन किया गया है, और प्रिंसिपल ने खुद इसकी दीवारों पर गोबर का लेप किया ताकि प्रयोग को प्रैक्टिकली जांचा जा सके।

Ajab-Gajab : “गोबर और मिट्टी को छूने में कोई बुराई नहीं”
प्रिंसिपल वत्सला का कहना है कि गोबर और मिट्टी का उपयोग भारतीय संस्कृति में सदियों से होता आया है और यह पूरी तरह से प्राकृतिक है। उन्होंने कहा, “यह हमारी पारंपरिक जीवनशैली का हिस्सा है। गोबर में जीवाणुनाशक गुण होते हैं और यह दीवारों को ठंडा रखने में कारगर साबित हो सकता है।”

उन्होंने यह भी बताया कि कुछ लोग बिना सही जानकारी के इस प्रयोग को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं। जबकि इस रिसर्च के परिणाम एक सप्ताह के भीतर सामने आ जाएंगे, जो यह साबित करेंगे कि यह उपाय कितनी हद तक प्रभावी है।

Ajab-Gajab : साइंस और संस्कृति का संगम
इस प्रयोग ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्या हमारी पारंपरिक जीवनशैली और प्राकृतिक उपाय आज के आधुनिक दौर में भी वैज्ञानिक रूप से उपयोगी हो सकते हैं? डॉ. वत्सला का प्रयास इसी दिशा में एक प्रेरणादायक कदम माना जा रहा है, जो विज्ञान और संस्कृति को एक मंच पर लाने का काम कर रहा है।


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